फ्लाईओवर ब्रिज वायरस का भयंकर प्रकोप
अनूपपुर। जिले में इन दिनों एक रहस्यमयी बीमारी ने आतंक मचा रखा है - फ्लाईओवर ब्रिज वायरस। यह वायरस न जनता को चैन लेने देता है, न अधिकारियों को काम करने। फर्क बस इतना है कि जनता परेशान है और अधिकारी बेफिक्र।
स्थिति यह है कि आम नागरिक नेता, विधायक, सांसद मंत्री और अधिकारियों की चौखट पर माथा टेक-टेक कर अब लगभग गंजेपन की स्थिति में पहुंच चुका है। परंतु दिलासा का इंजेक्शन रोजाना समय पर लगाया जा रहा है - “हो जाएगा… जल्दी ही हो जाएगा… बस इसी साल हो जाएगा…!”
अनूपपुर वासियों की हालत वैसी ही हो गई है, जैसे किसान आसमान की ओर देखकर बरसात का इंतज़ार करता है। बस यहां बादल की जगह लोहे का ढांचा है - जिसकी तरफ टकटकी लगाएं नागरिक कल्पना में स्कूटी उड़ा रहे हैं, कार दौड़ा रहे हैं, और हॉर्न बजाते हुए इस पार से उस पार पहुंच रहे हैं।
इधर नन्हें-मुन्नें बच्चें रोज़ पूंछ रहे हैं -
“पापा! ये फ्लाईओवर ब्रिज कब बनेगा? हम कब इस पर से स्कूल जाएंगे?”
अब बाप क्या बताएं?
उसे खुद डॉक्टर ने कहा है-
“टेंशन मत लो! जब ब्रिज बनेगा तभी BP भी नॉर्मल होगा।”
मरीज भी ICU में आकाश की तरफ नहीं बल्कि अधूरे ब्रिज की तरफ देखकर दुआ मांगते हैं-
“हे भगवान! वो दिन दिखा देना जब यह 5 मिनट का रास्ता 5 मिनट में ही पूरा हो जाए…”
कोरोना जैसे वायरस को विज्ञान ने हरा दिया…
लेकिन यह फ्लाईओवर ब्रिज वायरस इतना तगड़ा है कि
नेता, विधायक, सांसद, मंत्री और अधिकारी सब इसके इलाज में फेल!
इलाज का नाम होता-टेंडर मंज़ूरी
लेकिन उस फाइल के भी पंख लग गए -
कभी मंत्रालय, कभी विभाग, कभी चुनाव…
चक्कर काटते-काटते फाइल थक कर सो गई!
पत्रकार भी कितना लिखें?
अब उनकी कलम की स्याही भी सोचने लगी-
“भैया! एक ही खबर कब तक? मैं भी कुछ नया लिखना चाहता हूं!”
उधर सुनने में आया है कि
ठेकेदार के कर्मचारी छठ मनाने बिहार गए थे
वहां जाकर सोचा-
“ब्रिज से पहले सरकार बना आते हैं, लौटकर रंग-रोगन कर लेंगे!”
इसी कारण ब्रिज का रूप-रंग भी
दूल्हे की हल्दी जैसा अधूरा पड़ा है -
न बना है, न बिगड़ा है…
बस उम्मीद की स्कैफोल्डिंग पर टिका हुआ खड़ा है।
अंत में बस एक सवाल…
ये ब्रिज बनेगा या
अनूपपुर के नागरिक आने वाली पीढ़ी को स्टोरी सुनाएंगे?
“कभी यहां एक फ्लाईओवर बनने वाला था…”

