कक्का की चौपाल
लेखक
कैलाश पाण्डेय
क्या मोबाइल पर मिलेंगे अपने पूर्वज?”“पूर्वजों को जानने का अधिकार” – वंशावली, विज्ञान और संसद का रास्ता
गांव की शाम का अपना ही रंग होता है। सूरज ढलते ही खेतों से लौटते किसानों की आवाजें, बैलों की घंटियों की मधुर ध्वनि के साथ घरों और मंदिरों से शंख घड़ियाल की ध्वनि भी वातावरण को जीवंत बना रही है। ऐसे ही समय गांव के बीच आम के बड़े पेड़ के नीचे चौपाल में ग्रामीण इक्कठे हुए हैं। चारपाइयां बिछी हैं, पास में चाय की केतली खदबदा रही है और बीच में बैठे हैं कक्का।
तभी साइकिल की घंटी बजाते हुए खबरी लाल रिपोर्टर चौपाल पर पहुंचते हैं, पीछे-पीछे घसीटा चौरंगी लाल भी आ जाते हैं। कक्का मुस्कुराकर पूछते हैं, “क्या खबर है आज?”
खबरी लाल कहते हैं, “कक्का, अगर एक प्रस्ताव सच में संसद तक पहुंच गया तो आने वाली पीढ़ियां मोबाइल पर अपने पूर्वजों को खोज सकेंगी।”
घसीटा चौंकते हुए पूछते हैं, “अरे, अब पुरखों को भी गूगल पर ढूंढेंगे क्या?”
खबरी लाल बताते हैं कि शोधकर्ता डॉ. चिन्मय पाण्डेय ने “पूर्वजों को जानने का अधिकार अधिनियम” का प्रस्ताव रखा है। उनके अनुसार भारत में एक डिजिटल मंच बनाया जाए AUM (Ancestral Unified Metaverse) जहाँ हर नागरिक अपने परिवार का वंश वृक्ष देख सकेगा।
इस प्रस्ताव का ज्ञापन प्रधानमंत्री Narendra Modi, गृह मंत्री Amit Shah, संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju और संस्कृति मंत्री Gajendra Singh Shekhawat को दिया गया है।
कक्का याद दिलाते हैं कि भारत में वंशावली की परंपरा नई नहीं है। Prayagraj, Haridwar, Gaya और Rameswaram जैसे तीर्थों में पंडा पुजारी सदियों से परिवारों की वंशावली रजिस्टरों में दर्ज करते आए हैं, जहाँ कई परिवारों की 20–25 पीढ़ियों तक के नाम मिल जाते हैं।
नए प्रस्ताव के अनुसार AI आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कम से कम तीन से चार सौ वर्षों तक का वंश वृक्ष देखा जा सकेगा। इसके संचालन के लिए National Commission for Ancestral Wisdom (NCAW) नामक आयोग बनाने और हर वर्ष राष्ट्रीय पूर्वज दिवस मनाने का भी सुझाव दिया गया है।
खबरी लाल बताते हैं कि इससे पारिवारिक एकता मजबूत होगी, वंशानुगत स्वास्थ्य जानकारी मिल सकेगी और भारत की पारंपरिक ज्ञान परंपराओं का संरक्षण भी संभव होगा।
अंत में कक्का मुस्कुराकर कहते हैं,
“पेड़ तभी मजबूत होता है जब उसकी जड़ें गहरी हों। इंसान अपनी जड़ों को पहचान ले, तो समाज भी मजबूत रहेगा और देश भी।”
चौपाल धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है, लेकिन लोगों के मन में एक सवाल रह जाता है
क्या सच में आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वजों को डिजिटल दुनिया में खोज पाएंगी?

