🎨*ठाकुर साहब ने दी शाही दावत- होली में*
"व्यंग"
होली का दिन और ठाकुर साहब के बंगले पर शासन-प्रशासन की हाज़िरी न लगे ऐसा कैसे हो सकता है! महीनों की “मस्कत” रंग लाई। बड़े जतन से अधिकारियों, नगर पालिका के महारथियों और कुछ खास मेहमानों को निमंत्रण भेजा गया।
द्वार पर अबीर-गुलाल, अंदर गुजिया-नमकीन, और बीच में मुस्कुराहट ऐसी कि जैसे महीनो की मशक्कत एक ही दिन में सफल हो जानी हो। गले मिलना भी ऐसा कि कैमरे का एंगल पहले तय, भावनाएं बाद में।
ठंडाई के गिलास टकराए। एक अधिकारी महोदय ने दो घूंट में ही प्रशंसा का पुल बांध दिया ,
“वाह ठाकुर साहब! ऐसी मस्त ठंडाई तो कभी नहीं पी!”
ठाकुर साहब मन ही मन मुस्कुराए और सोचे “महीनों का पसीना आज सफल हुआ। नरवा-गढवा में जो कूद-फांद कर फोटो सेशन किया, जो वीडियो बनवाकर जनता को गंदे नालों की सच्चाई का दर्शन कराया, उसकी असली परीक्षा आज है।”
कहानी का असली रंग तो ठंडाई में घुला था। जिस प्याले में बर्फ थी, वह भी उसी नाली के जल से पवित्र हुई थी, और जिस ठंडाई को घोटा गया था, उसमें भी वही “विशेष जल” मिला था , वही जो बरसों से आम जनता की पाइप-लाइन में प्रेम पूर्वक बहता आया है।
मेहमानों ने बड़े चाव से पिया, खाया, और स्वाद का गुणगान किया। कुछ तो ऐसे झूमे मानो पारदर्शिता का नशा चढ़ गया हो। ठाकुर साहब को अपार शांति मिली ।
“जनता को जो सालों से परोसा गया, आज वही स्वाद खास मेहमानों ने भी चखा। न्याय का रंग आखिर बराबरी से चढ़ा।”
कहते हैं, भ्रष्टाचार का पेट भी अजीब होता है , सड़ा-गला ही उसे सुहाता है। शायद इसलिए सबने बड़े आनंद से ग्रहण किया और धन्यवाद देते हुए, हल्की डगमग चाल में अपने-अपने आशियानों की ओर प्रस्थान किया।
ठाकुर साहब आंगन में खड़े संतोष से मुस्कुराए ,
“जनता की आंखों की पट्टी हटाने का असली तरीका भाषण नहीं, स्वाद होता है।”
बाकी तो भाई, रंगों का त्योहार है।
किसी को गुलाल चढ़ा, किसी को सच्चाई।
*होली है… बुरा न मानो, होली है!*
*छिछोरा टाइम्स*
*प्रधान संपादक*
*बीरेंद्र सिंह"ओजस्वी"*
*अनूपपुर मध्य प्रदेश*

